रेल हमारी चलते-चलते, गीत प्यार के गाती है,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, सबका मेल कराती है|
सबकी हर-पल करे सुरक्षा, मात्र-भाव दिखलाती है,
उंच-नीच और जाति-पांति के, सारे भेद मिटाती है|
सबको कर स्वीकार प्रेम से, अपने दिल में रखती है,
सब धर्मों की एक राह, यह रेल हमें दिखलाती है|
होली,.ईद, दिवाली, क्रिसमस, को नहीं अलग समझती है,
हर त्यौहार "पर्व-मानवता", यही भावना रखती है|
नित्य नए लोगों को उनकी, मंजिल तक पहुंचाती है,
जीवन के इस मधुर सफ़र में, रिश्ते नए बनाती है|
एक धर्म हर इंशां का, यह मानवता बतलाती है,
रखना आपस में मेल-जोल, हर-पल यह सबसे कहती है|
क्षेत्र-प्रांत की बात कहाँ, इसे सीमा नहीं सुहाती है,
समझौता सन्देश लिए, उसपार प्रेम बरसाती है|
जीवन एक प्रवास, रेल हमको यह सबक सिखाती है,
जाति-धर्म की छोड़ भावना, मिलकर रहना कहती है|
नहीं पूछती कौम, ऐकता के दर्शन करवाती है,
जीवन के इस अटल-सफ़र में, खुशियाँ सिर्फ लुटाती है|
Thursday, November 25, 2010
Thursday, October 28, 2010
'शून्य दुर्घटना' लक्ष्य
हो 'शून्य दुर्घटना' लक्ष्य तेरा, और संरक्षा का बाण,
नियम सभी हों सैनिक तेरे, और विश्वास कमान|
कभी नहीं डरना जीवन में, लेना मन में ठान,
इश्वर भी तेरे संग रहेगा, बात मेरी ले मान||
जीवन है संघर्ष, मगर संरक्षा कवच सामान,
चक्रव्यूह हैं व्यसन सभी, मत करना तू आवाहन|
दुर्घटना से समर विजय, होना ही तेरा मुकाम,
सदा तेरी जयकार रहेगी, निश्चित लेना जान||
भूल-चूक, लापरवाही, तो सदा करे नुकसान,
दुर्घटना की जननी है, जन-मन को पाप सामान|
सतत कामना कर, इनसे तू मत रखना पहचान,
जीवन में खुशियाँ होंगी, सब पूरे हों अरमान||
लक्ष्य शून्य दुर्घटना का है, मन से करना चिंतन,
अपनी ह़ी जिम्मेदारी, कब समझेगा अंतर्मन|
बहुत हुआ आघात, दिलों में भरा हुआ है क्रंदन,
खुद से पूछो कहाँ कमी, सच कहता है ये दर्पण||
नियम सभी हों सैनिक तेरे, और विश्वास कमान|
कभी नहीं डरना जीवन में, लेना मन में ठान,
इश्वर भी तेरे संग रहेगा, बात मेरी ले मान||
जीवन है संघर्ष, मगर संरक्षा कवच सामान,
चक्रव्यूह हैं व्यसन सभी, मत करना तू आवाहन|
दुर्घटना से समर विजय, होना ही तेरा मुकाम,
सदा तेरी जयकार रहेगी, निश्चित लेना जान||
भूल-चूक, लापरवाही, तो सदा करे नुकसान,
दुर्घटना की जननी है, जन-मन को पाप सामान|
सतत कामना कर, इनसे तू मत रखना पहचान,
जीवन में खुशियाँ होंगी, सब पूरे हों अरमान||
लक्ष्य शून्य दुर्घटना का है, मन से करना चिंतन,
अपनी ह़ी जिम्मेदारी, कब समझेगा अंतर्मन|
बहुत हुआ आघात, दिलों में भरा हुआ है क्रंदन,
खुद से पूछो कहाँ कमी, सच कहता है ये दर्पण||
Saturday, October 9, 2010
रेल-ग्रंथ
दुर्घटना से रहित रेल, चलने का सबक सिखाती है,
जी एंड एस आर नहीं सिर्फ, वह रेल ग्रंथ कहलाती है|
स्टेशन और रेल, रेल से परिचित हमें कराती है||
पहला ही अध्याय, रेल की परिभाषा सिखलाती है,
नियमों का रख ज्ञान, हानि कैसे रोकें बतलाती है|
रेल कर्मचारी हो कैसा, दर्शन हमें कराती है||
सिग्नल और उपस्कर उसके, ज्ञान हमें दे जाती है,
गाड़ी कैसे चले, समय और गति प्रतिबन्ध बताती है|
चालक दल का साज़ और कर्त्तव्य बोध करवाती है||
स्टेशन का सफल-नियंत्रण, कार्य-चलन समझाती है,
शंटिंग कैसे करें, पाठ पंचम में बोध कराती है|
दुर्घटना से विषम कार्य में, कैसे बचें सिखाती है||
आग लगे गाड़ी टूटे, पर नहीं डरो तुम कहती है,
संचालन की पद्यतियां, अध्याय सात में मिलती हैं|
सिग्नल, गाड़ी-संचालन के, नियमों को कह देती है||
पूर्ण-ब्लाक में क्या कैसे हो, अष्टम बोध कराती है,
स्टेशन की श्रेणी के, अनुसार हमें समझाती है|
नवं स्वचल का ज्ञान करा, कर्तव्यों को बतलाती है||
सिंगल और डबल लाइन पर, निर्भय दौड़ो कहती है,
अनुगामी और पायलट-गार्ड, दस-ग्यारह में आती है|
ट्रेन स्टाफ और टिकट पद्यति, बारह में कह जाती है||
केवल एक चले गाड़ी, तेरह अध्याय बताती है,
चौदह में ब्लाक प्रचालन कर, पंद्रह में रेल बिछाती है|
सोलह में सम-पार बने, फाटक-वाला से कहती है||
विद्युत् वाले खंड के नियम, सत्रह में बतलाती है,
अठ्ठारहवां अध्याय सुनो, क्या बचा गया क्या कहती है|
यह रेल की गीता इसीलिए, बस रेल-ग्रंथ बन जाती है||
"संरक्षा दर्शन के अंक-28 में प्रकाशित"
जी एंड एस आर नहीं सिर्फ, वह रेल ग्रंथ कहलाती है|
स्टेशन और रेल, रेल से परिचित हमें कराती है||
पहला ही अध्याय, रेल की परिभाषा सिखलाती है,
नियमों का रख ज्ञान, हानि कैसे रोकें बतलाती है|
रेल कर्मचारी हो कैसा, दर्शन हमें कराती है||
सिग्नल और उपस्कर उसके, ज्ञान हमें दे जाती है,
गाड़ी कैसे चले, समय और गति प्रतिबन्ध बताती है|
चालक दल का साज़ और कर्त्तव्य बोध करवाती है||
स्टेशन का सफल-नियंत्रण, कार्य-चलन समझाती है,
शंटिंग कैसे करें, पाठ पंचम में बोध कराती है|
दुर्घटना से विषम कार्य में, कैसे बचें सिखाती है||
आग लगे गाड़ी टूटे, पर नहीं डरो तुम कहती है,
संचालन की पद्यतियां, अध्याय सात में मिलती हैं|
सिग्नल, गाड़ी-संचालन के, नियमों को कह देती है||
पूर्ण-ब्लाक में क्या कैसे हो, अष्टम बोध कराती है,
स्टेशन की श्रेणी के, अनुसार हमें समझाती है|
नवं स्वचल का ज्ञान करा, कर्तव्यों को बतलाती है||
सिंगल और डबल लाइन पर, निर्भय दौड़ो कहती है,
अनुगामी और पायलट-गार्ड, दस-ग्यारह में आती है|
ट्रेन स्टाफ और टिकट पद्यति, बारह में कह जाती है||
केवल एक चले गाड़ी, तेरह अध्याय बताती है,
चौदह में ब्लाक प्रचालन कर, पंद्रह में रेल बिछाती है|
सोलह में सम-पार बने, फाटक-वाला से कहती है||
विद्युत् वाले खंड के नियम, सत्रह में बतलाती है,
अठ्ठारहवां अध्याय सुनो, क्या बचा गया क्या कहती है|
यह रेल की गीता इसीलिए, बस रेल-ग्रंथ बन जाती है||
"संरक्षा दर्शन के अंक-28 में प्रकाशित"
Monday, September 27, 2010
"संरक्षा-गीत"
संरक्षा प्रहरी वही, सज़ग सदा तैनात,
ऐसे मानव श्रेष्ठ का, सुन्दर सुखद प्रभात||1||
लापरवाही से बड़ा, दूजा नहीं पिसाच|
सज़ग सदा रहना सखा, मौत रही है नाच||2||
संरक्षा उन्नत करो, तन - मन से तुम भ्रात|
संरक्षा उन्नति करे, सदा तुम्हारी तात||3||
ध्यान रखो चलता रहे, चक्का ठीक प्रकार|
अपने इस कर्त्तव्य को, मत जानो तुम भार||4||
ड्यूटी पर आना सदा, कर पूर्ण विश्राम|
थके हुए तन से नहीं, निपटा करते काम||5||
करें यात्रा रेल में, अगणित नित्य नवीन|
संरक्षा उनकी सदा, करना तुम परवीन||6||
ड्यूटी पर पूरा न हो, जब तक विनिमय काज|
तब तक मत जाना कहीं, मन में रख लो आज||7||
संरक्षा सबसे प्रथम, मन में लियो समाय|
संरक्षा तुमको सखा, जीवन भर हर्षाय||8||
नियमों का पालन करें, द्रढ़ता से सुविचार|
मुदित ह्रदय घर जाइए, पुलकित हो परिवार||9||
ठीक न यदि निर्णय लिया, माथे लगे कलंक|
पर्चा उलटा कर दिया, फिर काहे का अंक||10||
ड्यूटी के दौरान तुम, रहना सदा सतर्क|
नियमों का पालन करो, उचित न होते तर्क||11||
याद रखो हर मूल्य पर, दुर्घटना टल जाये|
कहना पड़ता बाद में, मिला बुरा फल हाय||12||
गाड़ी पटरी पर सदा, चले तुम्हारी मीत|
अधरों पर रखना सदा, संरक्षा के गीत||13||
चालक सिग्नल देखकर, निश्चित कर लो बात|
मौत न बैठी हो कहीं, निकट लगाये घात||14||
गाड़ी जब चलती रहे, चालक रखना ध्यान|
सिग्नल ऐसा मित्र है, सदा बचाए जान||15||
चालक वह रणवीर है, आगे लड़ता जाय|
सज़ग सदा रहना सखा, ना नींद नशा छू जाय||16||
स्टेशन मास्टर तेरा, स्टेशन ही तीर्थ|
ऐसे करना कार्य तुम, मिले सदा सत्कीर्ति||17||
याद रखो जब भी कभी, फ़ोन उठाओ हाथ|
स्टेशन का नाम लो, जैसे अंबरनाथ||18||
चाभी रखना पास में, अपने ही अधिकार|
जीवन में तुम पर सखा, नहीं पड़ेगी मार||19||
निज अंकों की पुस्तिका, बड़े काम की चीज़|
सदा रखो अधिकार में, कभी न आवे खीज||20||
आगत सिग्नल तुम स्वयं, बाहर देखो जाय|
सिग्नल डाउन ठीक है, ह्रदय शांत हो जाय||21||
आगत सिग्नल द्वार है, स्टेशन का भाय|
गाड़ी आने पर तुरत, उसको दियो उठाय||22||
केबिन असंतुष्टि की, पड़ जाये जब छाप|
सिग्नल डाउन न करो, उचित यही है बात||23||
कार्य करें अधीन जो, दो निश्चित आदेश|
और सुनिश्चित यह करो, समझे सही सन्देश||24||
काट-छाँट के काम में, मत करना विश्वास|
संचालन के काम में, उचीय नहीं परिहास||25||
लीवर कॉलर का सदा, तुम करना उपयोग|
संरक्षा की बात है, मत जानो कोई रोग||26||
उचित तरीके से सदा, प्रेषित हो सन्देश|
लाइन क्लिअर के समय, रखना ध्यान विशेष||27||
लाइन क्लिअर ठीक है, सही ट्रेन का नाम|
सदा सुनिश्चित यह करो, ठीक हो रहा काम||28||
निजी अंक दोहराइए, तीन तरह से आप|
रखना इस सन्देश की, सदा ह्रदय पर छाप||29||
शर्तें पूरी हों तथा, केबिन हो संतुष्ट|
सिग्नल दिलवाना तभी, कौन हो सके रुष्ट||30||
ब्लोक के उपकरण यदि, जब हो जाएँ खराब|
मत लाना उपयोग में, विनती यही जनाब||31||
जन-धन-श्रम की हानि हो, मन उपजे संताप|
दुर्घटनाओं से बड़ा, और न दूजा पाप||32||
नियम हमारे मित्र हैं, रखो गांठ से बांध|
ड्यूटी पर रहना सज़ग, सोना है अपराध||33||
चलती गाड़ी में कहीं, गरम धुरा यदि होय|
प्रथम परीक्षा के बिना, नहीं चलाना सोय||34||
ताला लग जाये तभी, सिग्नल दियो झुकाय|
यदि ताला आये नहीं, काँटा देखो जाय||35||
निज नियमों की पुस्तकें, रखो नियम अनुसार|
सुन्दर सुखद भविष्य के, सपने हों साकार||36||
संरक्षा धूमिल जभी, दुर्घटना तब होय|
बाबू जी भीतर रहे, ओढ़ चदरिया सोय||37||
कर्तव्यों का बोध है, है नियमों का ज्ञान|
पालन जो करते सदा, उनके हों गुणगान||38||
कुहरा यदि पड़ने लगे, दिन में कभी कभार|
सिग्नल जलवाना तुरत, यही एक उपचार||39||
ऐसे ही मत बैठना, धरे हाथ पर हाथ|
फॉग-पोर्टर भेजना, लिए पटाखा साथ||40||
"संरक्षा दर्शन के अंक-१६ में प्रकाशित"
ऐसे मानव श्रेष्ठ का, सुन्दर सुखद प्रभात||1||
लापरवाही से बड़ा, दूजा नहीं पिसाच|
सज़ग सदा रहना सखा, मौत रही है नाच||2||
संरक्षा उन्नत करो, तन - मन से तुम भ्रात|
संरक्षा उन्नति करे, सदा तुम्हारी तात||3||
ध्यान रखो चलता रहे, चक्का ठीक प्रकार|
अपने इस कर्त्तव्य को, मत जानो तुम भार||4||
ड्यूटी पर आना सदा, कर पूर्ण विश्राम|
थके हुए तन से नहीं, निपटा करते काम||5||
करें यात्रा रेल में, अगणित नित्य नवीन|
संरक्षा उनकी सदा, करना तुम परवीन||6||
ड्यूटी पर पूरा न हो, जब तक विनिमय काज|
तब तक मत जाना कहीं, मन में रख लो आज||7||
संरक्षा सबसे प्रथम, मन में लियो समाय|
संरक्षा तुमको सखा, जीवन भर हर्षाय||8||
नियमों का पालन करें, द्रढ़ता से सुविचार|
मुदित ह्रदय घर जाइए, पुलकित हो परिवार||9||
ठीक न यदि निर्णय लिया, माथे लगे कलंक|
पर्चा उलटा कर दिया, फिर काहे का अंक||10||
ड्यूटी के दौरान तुम, रहना सदा सतर्क|
नियमों का पालन करो, उचित न होते तर्क||11||
याद रखो हर मूल्य पर, दुर्घटना टल जाये|
कहना पड़ता बाद में, मिला बुरा फल हाय||12||
गाड़ी पटरी पर सदा, चले तुम्हारी मीत|
अधरों पर रखना सदा, संरक्षा के गीत||13||
चालक सिग्नल देखकर, निश्चित कर लो बात|
मौत न बैठी हो कहीं, निकट लगाये घात||14||
गाड़ी जब चलती रहे, चालक रखना ध्यान|
सिग्नल ऐसा मित्र है, सदा बचाए जान||15||
चालक वह रणवीर है, आगे लड़ता जाय|
सज़ग सदा रहना सखा, ना नींद नशा छू जाय||16||
स्टेशन मास्टर तेरा, स्टेशन ही तीर्थ|
ऐसे करना कार्य तुम, मिले सदा सत्कीर्ति||17||
याद रखो जब भी कभी, फ़ोन उठाओ हाथ|
स्टेशन का नाम लो, जैसे अंबरनाथ||18||
चाभी रखना पास में, अपने ही अधिकार|
जीवन में तुम पर सखा, नहीं पड़ेगी मार||19||
निज अंकों की पुस्तिका, बड़े काम की चीज़|
सदा रखो अधिकार में, कभी न आवे खीज||20||
आगत सिग्नल तुम स्वयं, बाहर देखो जाय|
सिग्नल डाउन ठीक है, ह्रदय शांत हो जाय||21||
आगत सिग्नल द्वार है, स्टेशन का भाय|
गाड़ी आने पर तुरत, उसको दियो उठाय||22||
केबिन असंतुष्टि की, पड़ जाये जब छाप|
सिग्नल डाउन न करो, उचित यही है बात||23||
कार्य करें अधीन जो, दो निश्चित आदेश|
और सुनिश्चित यह करो, समझे सही सन्देश||24||
काट-छाँट के काम में, मत करना विश्वास|
संचालन के काम में, उचीय नहीं परिहास||25||
लीवर कॉलर का सदा, तुम करना उपयोग|
संरक्षा की बात है, मत जानो कोई रोग||26||
उचित तरीके से सदा, प्रेषित हो सन्देश|
लाइन क्लिअर के समय, रखना ध्यान विशेष||27||
लाइन क्लिअर ठीक है, सही ट्रेन का नाम|
सदा सुनिश्चित यह करो, ठीक हो रहा काम||28||
निजी अंक दोहराइए, तीन तरह से आप|
रखना इस सन्देश की, सदा ह्रदय पर छाप||29||
शर्तें पूरी हों तथा, केबिन हो संतुष्ट|
सिग्नल दिलवाना तभी, कौन हो सके रुष्ट||30||
ब्लोक के उपकरण यदि, जब हो जाएँ खराब|
मत लाना उपयोग में, विनती यही जनाब||31||
जन-धन-श्रम की हानि हो, मन उपजे संताप|
दुर्घटनाओं से बड़ा, और न दूजा पाप||32||
नियम हमारे मित्र हैं, रखो गांठ से बांध|
ड्यूटी पर रहना सज़ग, सोना है अपराध||33||
चलती गाड़ी में कहीं, गरम धुरा यदि होय|
प्रथम परीक्षा के बिना, नहीं चलाना सोय||34||
ताला लग जाये तभी, सिग्नल दियो झुकाय|
यदि ताला आये नहीं, काँटा देखो जाय||35||
निज नियमों की पुस्तकें, रखो नियम अनुसार|
सुन्दर सुखद भविष्य के, सपने हों साकार||36||
संरक्षा धूमिल जभी, दुर्घटना तब होय|
बाबू जी भीतर रहे, ओढ़ चदरिया सोय||37||
कर्तव्यों का बोध है, है नियमों का ज्ञान|
पालन जो करते सदा, उनके हों गुणगान||38||
कुहरा यदि पड़ने लगे, दिन में कभी कभार|
सिग्नल जलवाना तुरत, यही एक उपचार||39||
ऐसे ही मत बैठना, धरे हाथ पर हाथ|
फॉग-पोर्टर भेजना, लिए पटाखा साथ||40||
"संरक्षा दर्शन के अंक-१६ में प्रकाशित"
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