Thursday, March 31, 2011

हे चालक श्रमवीर!

हे चालक  श्रमवीर  तुम्हें  चलते  रहना है,
पल - पल में व्यवधान तुम्हें लड़ते रहना है|
समय - सुरक्षा - संचालन  को  ढाल बनाकर,
नित नए सफ़र पर बस तुमको बढ़ाते रहना है||

चिंता  और  तनाव  यहाँ  सर  तान  खड़े  हैं,
व्यसनों के सब मकड़ जाल हर ओर घने हैं|
पर अपने मकसद को केवल ध्येय बनाकर,
हर हालत में तुमको हर पल खुश रहना है||
अपना  एक उद्देश्य  सफल  संचालन का है,
सहकर्मी   सहयोग   सदा   लेना   देना  है|
ख़ुशी ख़ुशी सबको उनकी मंजिल पहुंचाकर,
 चहरे  पर  मुस्कान  लिए  घर  में  जाना है||
अंतर्मन  की  सदा  सुनो  वह  सच कहता है,
सही गलत जो किया वहां सब कुछ दिखता है|
कार्य-कुशलता को शत प्रतिशत अंक लगाकर,
अपना  कार्य  तुम्हें  हर  पल अब्वल करना है||

Thursday, November 25, 2010

रेल हमारी

रेल हमारी चलते-चलते, गीत प्यार के गाती है,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, सबका मेल कराती है|
सबकी हर-पल करे सुरक्षा, मात्र-भाव दिखलाती है,
उंच-नीच और जाति-पांति के, सारे भेद मिटाती है|
सबको कर स्वीकार प्रेम से, अपने दिल में रखती है,
सब धर्मों की एक राह, यह रेल हमें दिखलाती है|
होली,.ईद, दिवाली, क्रिसमस, को नहीं अलग समझती है,
हर त्यौहार "पर्व-मानवता", यही भावना रखती है|
नित्य नए लोगों को उनकी, मंजिल तक पहुंचाती है,
जीवन के इस मधुर सफ़र में, रिश्ते नए बनाती है|
एक धर्म हर इंशां का, यह मानवता बतलाती है,
रखना आपस में मेल-जोल, हर-पल यह सबसे कहती है|
क्षेत्र-प्रांत की बात कहाँ, इसे सीमा नहीं सुहाती है,
समझौता सन्देश लिए, उसपार प्रेम बरसाती है|
जीवन एक प्रवास, रेल हमको यह सबक सिखाती है,
जाति-धर्म की छोड़ भावना, मिलकर रहना कहती है|
नहीं पूछती कौम, ऐकता के दर्शन करवाती है,
जीवन के इस अटल-सफ़र में, खुशियाँ सिर्फ लुटाती है|

Thursday, October 28, 2010

'शून्य दुर्घटना' लक्ष्य

हो 'शून्य दुर्घटना' लक्ष्य तेरा, और संरक्षा का बाण,
नियम सभी हों सैनिक तेरे, और विश्वास कमान|
कभी नहीं डरना जीवन में, लेना मन में ठान,
इश्वर भी तेरे संग रहेगा, बात मेरी ले मान||

जीवन है संघर्ष, मगर संरक्षा कवच सामान,
चक्रव्यूह हैं व्यसन सभी, मत करना तू आवाहन|
दुर्घटना से समर विजय, होना ही तेरा मुकाम,
सदा तेरी जयकार रहेगी, निश्चित लेना जान||

भूल-चूक, लापरवाही, तो सदा करे नुकसान,
दुर्घटना की जननी है, जन-मन को पाप सामान|
सतत कामना कर, इनसे तू मत रखना पहचान,
जीवन में खुशियाँ होंगी, सब पूरे हों अरमान||

लक्ष्य शून्य दुर्घटना का है, मन से करना चिंतन,
अपनी ह़ी जिम्मेदारी, कब समझेगा अंतर्मन|
बहुत हुआ आघात, दिलों में भरा हुआ है क्रंदन,
खुद से पूछो कहाँ कमी, सच कहता है ये दर्पण||

Saturday, October 9, 2010

रेल-ग्रंथ

दुर्घटना से रहित रेल, चलने का सबक सिखाती है,
जी एंड एस आर नहीं सिर्फ, वह रेल ग्रंथ कहलाती है|
स्टेशन और रेल, रेल से परिचित हमें कराती है||
पहला ही अध्याय, रेल की परिभाषा सिखलाती है,
नियमों का रख ज्ञान, हानि कैसे रोकें बतलाती है|
रेल कर्मचारी हो कैसा, दर्शन हमें कराती है||
सिग्नल और उपस्कर उसके, ज्ञान हमें दे जाती है,
गाड़ी कैसे चले, समय और गति प्रतिबन्ध बताती है|
चालक दल का साज़ और कर्त्तव्य बोध करवाती है||
स्टेशन का सफल-नियंत्रण, कार्य-चलन समझाती है,
शंटिंग कैसे करें, पाठ पंचम में बोध कराती है|
दुर्घटना से विषम कार्य में, कैसे बचें सिखाती है||
आग लगे गाड़ी टूटे, पर नहीं डरो तुम कहती है,
 संचालन की पद्यतियां, अध्याय सात में मिलती हैं|
सिग्नल, गाड़ी-संचालन के, नियमों को कह देती है||
पूर्ण-ब्लाक में क्या कैसे हो, अष्टम बोध कराती है,
स्टेशन की श्रेणी के, अनुसार हमें समझाती है|
नवं स्वचल का ज्ञान करा, कर्तव्यों को बतलाती है||
सिंगल और डबल लाइन पर, निर्भय दौड़ो कहती है,
अनुगामी और पायलट-गार्ड, दस-ग्यारह में आती है|
ट्रेन स्टाफ और टिकट पद्यति, बारह में कह जाती है||
केवल एक चले गाड़ी, तेरह अध्याय बताती है,
चौदह में ब्लाक प्रचालन कर, पंद्रह में रेल बिछाती है|
सोलह में सम-पार बने, फाटक-वाला से कहती है||
विद्युत् वाले खंड के नियम, सत्रह में बतलाती है,
अठ्ठारहवां अध्याय सुनो, क्या बचा गया क्या कहती है|
यह रेल की गीता इसीलिए, बस रेल-ग्रंथ बन जाती है||

    "संरक्षा दर्शन के अंक-28 में प्रकाशित"