निश्चय एक करो बस मन में,
संरक्षा को नहीं भूलना|
कितनी भी हो अगर शीघ्रता,
इस निश्चय को नहीं तोड़ना||
सेवा के कुछ नियम उन्हें तुम,
'आदेशों का डर' न समझना|
सेवा के कर्मों में सुख है,
खुश होकर निष्पादन करना||
जीवन-म्रत्यु सेतु संरक्षा,
इसका मतलव सदा समझना|
दिल से इसका पालन करके,
हर मकसद में पार उतरना||
गलती तो सबसे होती है,
पर-उपहास कभी नहीं करना|
संरक्षा में कोर-कसर के,
पात्र कभी पर तुम मत बनना||
मैं कुछ कहूँ उसे मत सुनना,
वो कुछ कहें कभी मत करना|
बुद्धिजीव हो अपना निश्चय,
लेकिन याद सदा तुम रखना||
"संरक्षा दर्शन अंक-30 में प्रकाशित"
Thursday, February 11, 2010
Friday, February 5, 2010
संरक्षा-संकल्प
दुर्घटना रुक जायेंगी, करो एक ही काम,
संरक्षा पालन सदा, प्रथम मंत्र लो जान|
नियमों का रखना सदा, अपने मन में ज्ञान,
पालन करना हर घडी, सदा होय गुणगान||
कोहरे में जब द्रष्यता, धूमिल पड़े लखाय,
गति नियंत्रित कीजिये, सिग्नल टेक लगाय|
पैदल की रफ़्तार से, गाढ़ी चलती जाय,
दुर्घटना से देर भली, सबकी जान बचाय||
नींद-नशा तो शत्रु हैं, सदा बंटाते ध्यान,
ज्ञान-तंत्र ढीला करें, होय सबल अज्ञान|
मालिक ने जब दे दिया, भले-बुरे का ज्ञान,
फिर क्यों सब-कुछ जानकर, बनते हो अज्ञान||
दुर्घटना हर पल रहे, बैठी घात लगाय,
तनिक नहीं करती रहम, सब-कुछ देत मिटाय|
संरक्षा की जस घडी, अनदेखी हो जाय,
वही एक पल, ज़िन्दगी देता दुखी बनाय||
संरक्षा के मंत्र यदि, सदा रखोगे याद,
कभी नहीं होगी हँसी, ना होगा अवसाद|
जन-जीवन के चमन की, फ़िज़ां न हो बर्बाद,
सुखमय जीवन का सदा, मिलता रहे प्रसाद||
संरक्षा की राह में, ज्ञान न होता अल्प,
दुर्घटना पर विजय का, दूजा नहीं विकल्प|
सोच-सोच कर सोच में, गुज़र न जाये कल्प,
आओ सब मिलकर करें, संरक्षा-संकल्प||
संरक्षा पालन सदा, प्रथम मंत्र लो जान|
नियमों का रखना सदा, अपने मन में ज्ञान,
पालन करना हर घडी, सदा होय गुणगान||
कोहरे में जब द्रष्यता, धूमिल पड़े लखाय,
गति नियंत्रित कीजिये, सिग्नल टेक लगाय|
पैदल की रफ़्तार से, गाढ़ी चलती जाय,
दुर्घटना से देर भली, सबकी जान बचाय||
नींद-नशा तो शत्रु हैं, सदा बंटाते ध्यान,
ज्ञान-तंत्र ढीला करें, होय सबल अज्ञान|
मालिक ने जब दे दिया, भले-बुरे का ज्ञान,
फिर क्यों सब-कुछ जानकर, बनते हो अज्ञान||
दुर्घटना हर पल रहे, बैठी घात लगाय,
तनिक नहीं करती रहम, सब-कुछ देत मिटाय|
संरक्षा की जस घडी, अनदेखी हो जाय,
वही एक पल, ज़िन्दगी देता दुखी बनाय||
संरक्षा के मंत्र यदि, सदा रखोगे याद,
कभी नहीं होगी हँसी, ना होगा अवसाद|
जन-जीवन के चमन की, फ़िज़ां न हो बर्बाद,
सुखमय जीवन का सदा, मिलता रहे प्रसाद||
संरक्षा की राह में, ज्ञान न होता अल्प,
दुर्घटना पर विजय का, दूजा नहीं विकल्प|
सोच-सोच कर सोच में, गुज़र न जाये कल्प,
आओ सब मिलकर करें, संरक्षा-संकल्प||
"संरक्षा दर्शन के अंक-31 में प्रकाशित"
Saturday, January 30, 2010
दिल में रखना हर-दम
संरक्षा को समझ प्रेमिका, दिल में रखना हर-दम|
नहीं पडेगा पछताना, सब सुखी रहेंगे हर - दम||
कर पूरा विश्राम, काम पर जाना याद रखोगे,
ड्यूटी पर रहकर घर की सब, याद सखा विसरोगे|
संरक्षा तेरे दिल में फिर, साथ रहेगी हर-दम||
नहीं पड़ेगा पछताना.........................................||
कर्म सिर्फ है धर्म, कभी तुम भार इसे न समझना,
नियमों के अनुसार काम को, तन्मयता से करना|
संरक्षा तन-मन को तेरे, स्वस्थ रखेगी हर-दम||
नहीं पडेगा पछताना.........................................||
सदा काम में लापरवाही, सिर्फ हानि करती है,
चौकन्ने और सज़ग व्यक्ति से, दुर्घटना डरती है|
लगा रहे दिल संरक्षा से, मुदित ह्रदय हो हर-दम||
नहीं पड़ेगा पछताना.........................................||
कैसे भी संरक्षा से, सदा मोहब्बत करना,
काट-छाँट के कामों से, मेरे यार हमेशा डरना|
जल्दी का फल कभी नहीं, मीठा होता सुन रे मन||
नहीं पड़ेगा पछताना.........................................||
"संरक्षा दर्शन के अंक-20 में प्रकाशित"
रेल साथियो
रेल साथियो सुनो अगर, जीवन को सफल बनाना है,
संरक्षा को हरदम - हरपल, सबसे आगे रखना है||
संरक्षा को हरदम - हरपल, सबसे आगे रखना है||
नियत समय पर दिए काम को, सही ढंग से करना है,
ड्यूटी पर रहते हुए मित्रो, आलस कभी न लाना है|
समय-बद्धता, अनुशासन और नियमों को अपनाना है,
संरक्षा को.......................................................||
संरक्षा को.......................................................||
रेल चलने की खातिर, सब साथी सदां सजग रहना,
रेल-खंड के हर चप्पे पर, अपनी तेज नज़र रखना|
दुनियां जिस पर करे नाज़, हमें ऐसे रेल चलाना है,
संरक्षा को..................................................||
भारतीय रेल के श्रम-वीरो, ऐसे व्यवहार कुशल बनना,
यात्री-गण या सहकर्मी से, कभी नहीं अनबन करना|
टीम-भावना दिल में रखकर, सारे काम कराना है,
संरक्षा को....................................................||
चालक-संरक्षक इसके तुम, अपना एक ध्येय रखना,
रेल चले तब देश चले, इसका विस्मरण नहीं करना|
कैसे भी हो तुम्हें रेल को, मंजिल तक पहुंचाना है,
संरक्षा को...................................................||
करना गर्व हमेशा लेकिन, अभिमानी नहीं बनना तुम,
ना कोई बड़ा नहीं कोई छोटा, सभी कर्मचारी हैं हम|
सबका ही उद्देश्य एक, मिल-जुलकर रेल चलाना है,
संरक्षा को...................................................||
"संरक्षा दर्शन के अंक-21 में प्रकाशित"
"संरक्षा दर्शन के अंक-21 में प्रकाशित"
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